Friday, 11 March 2016

पर्यावरण संरक्षणवादी महान धर्म : हिन्दू धर्म 

हिन्दू धर्म में परिवर्तन की आवश्यकता १ 

वसुधैव कुटुम्बकम : हिन्दू  धर्म की एक महान सोच
 
हिन्दू धर्म अत्यंत ही प्राचीन होने के साथ साथ एक परिवर्तनशील आधुनिक धर्म भी है और कुछ अन्य धर्मों की तरह अप्रगतिशील और पुरानी गलत धारणाओं पर अडिग नहीं है। समय समय पर यह आधुनिक विचारों को भी अपनाता आया है , और यही कारण है कि इसमें पुरातन होने के साथ साथ नवीनता भी है।

वैसे तो हिन्दू धर्म पर्यावरण के साथ बहुत ही अच्छी तरह से हिला मिला हुआ है। इसी कारण पर्यावरण की प्रत्येक वस्तु का इसमें सम्मान किया जाता है।  पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, वन, वृक्ष, नदियां, जीव  इत्यादि इत्यादि सभी को कुछ न कुछ महत्वपूर्ण स्थान देकर सम्मान दिया जाता है, और इनकी देवी या देवता स्वरुप में पूजा की जाती है और इनका संरक्षण किया जाता रहा है। और इन सब में नदियों का एक विशेष स्थान है। इसी कारणवश नदियों को माता बोला जाता रहा है। कुल मिलाकर हिन्दू धर्म पर्यावरण के प्रति बहुत संवेंदनशील है और अपने आस पास की प्रकृति के साथ हिलमिलकर रहना सिखाता है।

परन्तु यहाँ अभी कुछ अन्य आधुनिकीकरण की और आवश्यकता है।  जैसे कि नदियों का ही सबसे ज्यादा दुरपयोग भी होता रहा है। इसमें कुछ सुधार की आवश्यकता है। कुछ परम्पराएँ हैं जो की नदियों के सरक्षण के विरुद्ध हैं।  जैसे की निम्न परम्पराएँ , जिनमे सुधार की अत्यधिक आवश्यकता है।
    नदियों को गन्दा करने की परंपरा:-
        १. नदियों के तट पर शव का दाह संस्कार।
        २. नदियों में अस्थि प्रवाह ।
        ३. नदियों में पितरों के श्राद्ध इत्यादि का अर्पण ।
        ४. नदियों में हवन सामग्री का प्रवाह।
शव के दाह संस्कार के लिए लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है।  यह दो-तीन प्रकार से पर्यावरण को नुकसान पंहुचाता है , १ : धुंए से वायु प्रदूषण २ : पेड़ों की कटाई  ३ : जब यह नदी के तट पर होता है तो नदी भी प्रदूषित होती है।

 कुछ उपाय:-
          शव दाह संस्कार विद्द्युत शव दाह गृह (Electric Incinerator) में ही होना चाहिए।
          अस्थियों की राख को खाद के रूप में वन या खेत खलियानों में बिखेर देना चाहिए.

नदियों के तटों पर मेलों की प्रथा में भी यह प्रावधान होना चाहिए की श्रद्धालु लोग वहां पर गन्दगी न करें, श्रद्धालुओं को धार्मिक रूप से और अधिक शिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे माता समान पूजनीय नदियों  के तटों को गन्दा न करें ।

पूरी कोशिश ये होनी चाहिए की नदियां गन्दी न हों। भूमि का भी अनावश्यक रूप से दुरपयोग न हो। और इस आधुनिकीकरण के कार्य के लिए हिन्दू धर्म गुरुओं को आगे आकर सामान्यजन को अपने प्रवचनों से शिक्षित करना चाहिए।

जय गंगा मैया।

एवमस्तु।

अगर लेख में कुछ त्रुटि हो या आप इन उपरोक्त विचारों से सहमत न हों तो क्षमा कीजियेगा।  परन्तु यहाँ पर लेख की भावना गलत नहीं है।

लेख पढ़ने के लिए बहुत बहुत सादर धन्यवाद।


Ganga Polluted